फिल्मी गीतों के दर्पण में सुहाग के प्रति प्रेम एवं समर्पण के प्रतीक करवा चौथ पर्व का सुंदर रूप जब-तब दिखाई देता रहता है । कई फिल्मकारों ने करवा चौथ के गीतों के जरिए नायक, नायिका की प्रेमाभिव्यक्ति को रपहले परदे पर उतारा है। करवा चौथ के सामयिक गीतों की विशेषता यह रही है कि इनका फिल्मांकन बेहद प्रभावी ढंग से किया गया है। कई नई पुरानी फिल्मों में शामिल ये गीत काफी हिट रहे हैं। करवा चौथ के ज्यादातर गीतों में पति-पत्नी के किरदारों को अभिनीत करते नायक, नायिका अपनी मोहब्बत का इजहार करते हुए एक-दूसरे की हमेशा सलामती की दुआ मांगते नजर आते हैं जबकि कुछ गीतों में विरह की व्याकुलता को दर्शाया गया है।
कुछेक पुरानी फिल्मों में करवा चौथ के गीतों को बेहद सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। ऐसी प्रस्तुति आज भी कुछ फिल्म निर्माता यदा-कदा अपनी फिल्मों में दे रहे हैं। साठ-सत्तर के दशक के बीच एक फिल्म 'सुहागरात" आई थी, जिसमें एक गीत 'गंगा मैया में जब तक कि पानी रहे. मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे" में करवा चौथ की महत्ता को प्रदर्शित कियागया था। 'सुहागरात" को ही घर छोड़कर कहीं चले गए पति के प्रति पत्नी का विश्वास एवं समर्पण भाव और भारतीय नारी की एकनिष्ठता की छवि इस गीत में नजर आती है। भारतीय समाज में पारम्परिक विवाह के साथ ही गंधर्व विवाह भीअपना एक अलग वजूद रखता है। दक्षिण भारत की हिन्दी फिल्म के रीमेक 'मांग भरो सजना" ऐसे ही विषय से प्रेरित थी। फिल्म के नायक का नायिका से पारम्परिक विवाह होता है जबकि उसका पहले ही किसी अन्य महिला से परिस्थितिजन्य गंधर्व विवाह हो चुका रहता है। एक पति के प्रति दोनों पत्नियों का एक जैसा प्रेम एवं समर्पण करवाचौथ के इस गीत 'दीपक मेरे सुहाग का जलता रहे, कभी चांद, कभी सूरज बनके निकलता रहे" में दिखाई देता है। अपने समय का यहसुपरहिट गीत आज भी करवा चौथ के मौके पर सुनाई दे जाता है।
हिन्दू सामाजिक मान्यता के अनुसार करवा चौथ का व्रत पति या भावी पति के लिए रखा जाता है। आदित्य चोपड़ा की फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" नायिका भावी पति के बजाय अपने प्रेमी की छवि दिल में संजोए रखती है और करवा चौथ का व्रत भी वह भावी पति के बजाय प्रेमी का चेहरा देखकर ही तोड़ती है। नए निर्माता-निर्देशकों ने भी अपनी पारिवारिक फिल्मों के गीतों में करवा चौथ को सामयिक संदर्भों में स्थान दिया है। चाहे वह करन जौहर की 'कभी खुशी कभी गम" हो या फिर संजय लीला भंसाली की 'हम दिल दे चुके सनम हो" इन फिल्मों में करवा चौथ के दौरान पुरानी पीढ़ी के किरदारों के साथ ही नई पीढी की नायिकाएं अपने नायक के प्रेम की अठखेलियां करती नजर आती हैं। 'हम दिल दे चुके सनम" में करवा चौथ के चांद को इंगित करके नायक 'चांद छुपा बादल में शरमा के मेरी जानां सीने से लग जाना तू" गीत में नायिका से अपनी मोहब्बत का इजहार करता है।
आम धारणा है कि पत्नी अपने पति के लिए करवा चौथ का व्रतरखती है लेकिन बदलते दौर में बहुत से पति भी इस दिन उपवास रखकर पत्नी का साथ देते हैं। निर्माता-निर्देशक रवि चोपडा की फिल्म 'बागबां" में केंद्रीय किरदार अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी करवा चौथ का व्रत रखते हैं। इस मौके पर परिस्थितिजन्य दोनों अलग-अलग रहते हैं लेकिन टेलीफोन पर वार्तालाप के जरिए अपनीविरह वेदना व्यक्त करते हैं। इस फिल्म ने ऐसी छाप छोड़ी है कि निजी जीवन में भी बहुत से पति करवा चौथ का व्रत रखने लगे हैं।
Tuesday, October 26, 2010
Wednesday, October 13, 2010
'खंडवे वाले किशोर का सबको राम-राम"
किशोर दा जैसी शख्सियत हमारी फिल्मी दुनिया में दोबारा होना नामुमकिन है। वे जितने अच्छे गायक थे उतने ही अभिनेता, कमेडियन और संगीतकार भी। पुरानी पीढ़ी के साथ नई पीढ़ी भी उनके गीतों की दीवानी है। तभी उनका हर इक गीत आज भी दिल के करीब लगता है। अटपटी बातों के लिए मशहूर किशोर दा अक्सर अपना नाम उल्टा बताते थे यानि रशोकि रमाकु। इक बार इंदौर में लता मंगेशकर अवार्ड के लिए उन्हें इंदौर बुलाया गया। तो उन्होंने आयोजकों के ख्वाहिश रखी वे एयरपोर्ट से स्टेडियम तक बैलगाड़ी से जाना चाहते हैं। सुरक्षा कारण उनकी यह मुराद पुरी नहीं हो सकी।
बचपन में रेडियो पर गाना सुनकर उन्होंने गायकी में महारत हासिल कर ली थी। वे अक्सर बाथरूम में जोर जोर से गाया करते थे। जैसे रफी साहब शम्मी कपूर की आवाज बन गए थे वैसे ही किशोर दा राजेश खन्नाा की। राजेश खन्नाा, किशोर कुमार और आरडी बर्मन का ऐसा जादू चला कि राजेश खन्नाा सुपर सितारा बन गए। वे हर स्टेजशो से पहले कहते थे 'खंडवे वाले किशोर का सबको राम-राम"।
किशोर दा अक्सर कहा करते थे कि 'दूध-जलेबी खाएंगे और खंडवा में बस जाएंगे।" यही कहते-कहते 13 अक्टूबर 1987 को वे इस दुनिया को छोड़ कर हमेशा-हमेशा के लिए चले गए।
आज उनकी याद में मैंने यूट्यूब से नॉन फिल्मी गाना उड़ाया उसे ही सुनवा रहा हूं।
बचपन में रेडियो पर गाना सुनकर उन्होंने गायकी में महारत हासिल कर ली थी। वे अक्सर बाथरूम में जोर जोर से गाया करते थे। जैसे रफी साहब शम्मी कपूर की आवाज बन गए थे वैसे ही किशोर दा राजेश खन्नाा की। राजेश खन्नाा, किशोर कुमार और आरडी बर्मन का ऐसा जादू चला कि राजेश खन्नाा सुपर सितारा बन गए। वे हर स्टेजशो से पहले कहते थे 'खंडवे वाले किशोर का सबको राम-राम"।
किशोर दा अक्सर कहा करते थे कि 'दूध-जलेबी खाएंगे और खंडवा में बस जाएंगे।" यही कहते-कहते 13 अक्टूबर 1987 को वे इस दुनिया को छोड़ कर हमेशा-हमेशा के लिए चले गए।
आज उनकी याद में मैंने यूट्यूब से नॉन फिल्मी गाना उड़ाया उसे ही सुनवा रहा हूं।
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